श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 35: माल्यवान् का रावण को श्रीराम से संधि करने के लिये समझाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  6.35.17 
विषयेषु प्रसक्तेन यत्किंचित्कारिणा त्वया।
ऋषीणामग्निकल्पानामुद्वेगो जनितो महान्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
सांसारिक सुखों में आसक्त होकर तूने जो चाहा सो किया और स्वेच्छाचार किया है, जिससे अग्नि के समान तेज वाले ऋषिगण बहुत व्याकुल हो गए हैं॥17॥
 
You, who are attached to worldly pleasures, have done whatever you want and have behaved willfully, which has greatly agitated the sages, whose brilliance is like fire.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)