श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 31: मायारचित श्रीराम का कटा मस्तक दिखाकर रावण द्वारा सीता को मोह में डालने का प्रयत्न  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  6.31.1-2 
ततस्तमक्षोभ्यबलं लङ्कायां नृपतेश्चरा:।
सुवेले राघवं शैले निविष्टं प्रत्यवेदयन्॥ १॥
चाराणां रावण: श्रुत्वा प्राप्तं रामं महाबलम्।
जातोद्वेगोऽभवत् किंचित् सचिवानिदमब्रवीत्॥ २॥
 
 
अनुवाद
जब राक्षसराज रावण के गुप्तचरों ने लंका में लौटकर यह समाचार दिया कि श्री रामचन्द्रजी की सेना ने सुवेल पर्वत पर आकर डेरा डाल दिया है और उसे जीतना असम्भव है, तब उन गुप्तचरों की बातें सुनकर और महाबली श्री रामजी को आया हुआ जानकर रावण कुछ विचलित हुआ। उसने अपने मन्त्रियों से इस प्रकार कहा -॥1-2॥
 
When the spies of the demon king Ravana returned to Lanka and informed that Shri Ramchandra's army had come and camped at Suvela mountain and it was impossible to conquer it, then on hearing the words of those spies and knowing that the mighty Shri Ram had arrived, Ravana became a little agitated. He told his ministers thus -॥1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)