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श्लोक 6.29.14  |
अपध्वंसत नश्यध्वं संनिकर्षादितो मम।
नहि वां हन्तुमिच्छामि स्मराम्युपकृतानि वाम्।
हतावेव कृतघ्नौ द्वौ मयि स्नेहपराङ्मुखौ॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| अब तुम दोनों मेरे दरबार में आने के अधिकार से वंचित हो। मेरे पास से चले जाओ; फिर कभी मुझे अपना मुख मत दिखाना। मैं तुम दोनों को मारना नहीं चाहता; क्योंकि मैं तुम दोनों के उपकारों को सदैव स्मरण रखता हूँ। तुम दोनों मेरे प्रेम के विमुख और कृतघ्न हो, अतः मृत समान हो।॥14॥ |
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| ‘Now both of you are deprived of the right to enter my court. Go away from me; never show your face to me again. I do not want to kill both of you; because I always remember the favors done by both of you. Both of you are averse to my love and ungrateful, hence you are as good as dead.’॥ 14॥ |
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