| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 6: युद्ध काण्ड » सर्ग 27: वानरसेना के प्रधान यूथपतियों का परिचय » श्लोक 34-38h |
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| | | | श्लोक 6.27.34-38h  | भ्रमराचरिता यत्र सर्वकालफलद्रुमा:॥ ३४॥
यं सूर्यस्तुल्यवर्णाभमनुपर्येति पर्वतम्।
यस्य भासा सदा भान्ति तद्वर्णा मृगपक्षिण:॥ ३५॥
यस्य प्रस्थं महात्मानो न त्यजन्ति महर्षय:।
सर्वकामफला वृक्षा: सदा फलसमन्विता:॥ ३६॥
मधूनि च महार्हाणि यस्मिन् पर्वतसत्तमे।
तत्रैष रमते राजन् रम्ये काञ्चनपर्वते॥ ३७॥
मुख्यो वानरमुख्यानां केसरी नाम यूथप:। | | | | | | अनुवाद | | जिस पर्वत पर सब ऋतुओं में फल देने वाले वृक्ष भौंरों से सेवित दिखाई देते हैं, जिस पर्वत पर सूर्यदेव प्रतिदिन अपने ही रंग के पर्वत की परिक्रमा करते हैं, जिसकी प्रभा से वहाँ के मृग और पक्षी सदैव सुवर्णमय दिखाई देते हैं, जिसके शिखर को महर्षि कभी नहीं छोड़ते, जहाँ के सब वृक्ष फलरूप सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तुएँ प्रदान करते हैं और उन पर सदैव फल लगे रहते हैं, जिस उत्तम शिला पर बहुमूल्य मधु उपलब्ध होता है, उस अत्यंत सुंदर सुवर्णमय पर्वत महामेरु पर वानरों के प्रधान केसरी रमण करते हैं॥ 34-37 1/2॥ | | | | The mountain on which trees which bear fruit in all the seasons are seen served by bumblebees, the Sun God revolves around the mountain of his own colour every day, the deer and birds there always appear golden in colour due to the radiance of which, the great sages never abandon the peak of which, all the trees there provide all the desired things in the form of fruits and fruits are always present on them, the excellent rock on which precious honey is available, on that very beautiful golden mountain Mahameru, the chief of the monkeys, Kesari, enjoys.॥ 34-37 1/2॥ | | ✨ ai-generated | | |
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