श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 27: वानरसेना के प्रधान यूथपतियों का परिचय  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  6.27.10-11 
यवीयानस्य तु भ्राता पश्यैनं पर्वतोपमम्।
भ्रात्रा समानो रूपेण विशिष्टस्तु पराक्रमे॥ १०॥
स एष जाम्बवान् नाम महायूथपयूथप:।
प्रशान्तो गुरुवर्ती च सम्प्रहारेष्वमर्षण:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
इस धूम्र का छोटा भाई जाम्बवान है, जो महारथियों का भी सरदार है। देखो, वह कैसा पर्वत-सा दिखता है। वह देखने में अपने भाई के समान ही है; किन्तु उससे भी अधिक पराक्रमी है। उसका स्वभाव शान्त है। वह अपने बड़े भाई और बड़ों की आज्ञा में रहता है और उनकी सेवा करता है। युद्ध के अवसर पर उसका क्रोध और आक्रोश बहुत बढ़ जाता है॥10-11॥
 
‘The younger brother of this Dhumra is Jambvan, who is the leader of the greatest leaders. See how mountain-like he looks. He is similar to his brother in looks; but is even more valorous than him. His nature is calm. He remains under the command of his elder brother and elders and serves them. On the occasion of war, his anger and resentment increase a lot.॥ 10-11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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