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श्लोक 6.26.44-46  |
यस्तु गैरिकवर्णाभं वपु: पुष्यति वानर:॥ ४४॥
अवमत्य सदा सर्वान् वानरान् बलदर्पित:।
गवयो नाम तेजस्वी त्वां क्रोधादभिवर्तते॥ ४५॥
एनं शतसहस्राणि सप्तति: पर्युपासते।
एषैवाशंसते लङ्कां स्वेनानीकेन मर्दितुम्॥ ४६॥ |
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| अनुवाद |
| गेरू के समान लाल रंग का शरीर धारण करने वाले उस तेजस्वी वानर का नाम 'गवय' है । उसे अपने बल का बड़ा अभिमान है । वह सदैव समस्त वानरों का तिरस्कार करता है । देखो, वह किस क्रोध से तुम्हारी ओर आ रहा है । सत्तर लाख वानर उसकी सेवा में हैं । वह अपनी सेना के द्वारा लंका को धूल में मिला देने की भी इच्छा रखता है ॥ 44-46॥ |
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| ‘The name of that illustrious monkey who maintains a body of red colour like ochre is ‘Gavaya’. He is very proud of his strength. He always despises all the monkeys. See, with what fury he is coming towards you. Seventy lakh monkeys are in his service. He also desires to reduce Lanka to dust with the help of his army.॥ 44-46॥ |
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