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ramayan 6.21.21-22: 'सुमित्रानन्दन! यह समुद्र समनिता का आश्रय लेने के कारण मुझे अपना रूप नहीं दिखा रहा है, इसलिए तुम धनुष और विषधर सर्पों के समान भयंकर बाण ले आओ। मैं समुद्र को सुखा दूँगा; फिर वानरों को पैदल लंकापुरी जाना चाहिए।'   |   ramayan सर्ग 6.21: श्रीराम का समुद्र के तट पर तीन दिनों तक धरना देने पर भी समुद्र के दर्शन न देने से बाण मारकर विक्षुब्ध कर देना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 21: श्रीराम का समुद्र के तट पर तीन दिनों तक धरना देने पर भी समुद्र के दर्शन न देने से बाण मारकर विक्षुब्ध कर देना  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  6.21.21-22 
न दर्शयति साम्ना मे सागरो रूपमात्मन:॥ २१॥
चापमानय सौमित्रे शरांश्चाशीविषोपमान्।
समुद्रं शोषयिष्यामि पद्भॺां यान्तु प्लवंगमा:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
'सुमित्रानन्दन! यह समुद्र समनिता का आश्रय लेने के कारण मुझे अपना रूप नहीं दिखा रहा है, इसलिए तुम धनुष और विषधर सर्पों के समान भयंकर बाण ले आओ। मैं समुद्र को सुखा दूँगा; फिर वानरों को पैदल लंकापुरी जाना चाहिए।'
 
‘Sumitranandan! This ocean is not revealing its form to me because it has taken shelter of the samanita, so bring the bow and the dreadful arrows like poisonous snakes. I will dry up the ocean; then the monkeys should go to Lankapuri on foot.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)