श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 20: शार्दूल के कहने से रावण का शुक को दूत बनाकर सुग्रीव के पास संदेश भेजना, सुग्रीव का रावण के लिये उत्तर देना  »  श्लोक 32-33
 
 
श्लोक  6.20.32-33 
शुकस्तु वानरैश्चण्डैस्तत्र तै: सम्प्रपीडित:।
व्याचुक्रोश महात्मानं रामं दशरथात्मजम्।
लुप्येते मे बलात् पक्षौ भिद्येते मे तथाक्षिणी॥ ३२॥
यां च रात्रिं मरिष्यामि जाये रात्रिं च यामहम्।
एतस्मिन्नन्तरे काले यन्मया ह्यशुभं कृतम्।
सर्वं तदुपपद्येथा जह्यां चेद् यदि जीवितम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
उन भयंकर वानरों से पीड़ित होकर शुकदेव ने दशरथपुत्र भगवान राम को जोर से पुकारा और कहा - "हे प्रभु! मेरे पंख बलपूर्वक नोचे जा रहे हैं और मेरी आँखें निकाली जा रही हैं। यदि मैं आज प्राण त्याग दूँ, तो जिस रात्रि में मैं पैदा हुआ हूँ और जिस रात्रि में मैं मरूँगा, उन दोनों के बीच, जन्म और मृत्यु के इस अंतराल में मैंने जो भी पाप किये हैं, वे सब आपके ही होंगे।" ॥32-33॥
 
Suffering from those fierce monkeys, Shuka called out loudly to Lord Rama, the son of Dasharatha, and said, "O Lord! My wings are being forcefully torn and my eyes are being gouged out. If I give up my life today, then whatever sins I have committed between the night I was born and the night I die, in this intervening period between birth and death, will be yours only." ॥32-33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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