श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 2: सुग्रीव का श्रीराम को उत्साह प्रदान  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  6.2.19 
तदलं शोकमालम्ब्य क्रोधमालम्ब भूपते।
निश्चेष्टा: क्षत्रिया मन्दा: सर्वे चण्डस्य बिभ्यति॥ १९॥
 
 
अनुवाद
‘पृथ्वीनाथ! अपने हृदय में शोक को स्थान देना व्यर्थ है। इस समय आपको शत्रुओं के प्रति क्रोध का ही आचरण करना चाहिए। जो क्षत्रिय मन्द (क्रोध से रहित) हैं, वे कुछ भी नहीं कर सकते; किन्तु जो शत्रु के प्रति आवश्यक क्रोध से युक्त है, उससे सभी लोग भयभीत रहते हैं॥ 19॥
 
‘Prithvi Nath! It is useless to give place to grief in your heart. At this time, you should adopt anger towards the enemies. Those Kshatriyas who are slow (devoid of anger) cannot do anything; but the one who is filled with the necessary anger towards the enemy, everyone is afraid of him.॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)