श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 2: सुग्रीव का श्रीराम को उत्साह प्रदान  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  6.2.17 
नहि पश्याम्यहं कंचित् त्रिषु लोकेषु राघव।
गृहीतधनुषो यस्ते तिष्ठेदभिमुखो रणे॥ १७॥
 
 
अनुवाद
रघुनन्दन! मैं तीनों लोकों में ऐसा कोई वीर नहीं देखता, जो धनुष धारण करके रणभूमि में आपके सामने खड़ा हो सके॥17॥
 
Raghunandan! I do not see any such brave man in the three worlds, who can stand before you in the battlefield holding a bow.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)