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ramayan 6.19.34-35h: भगवान् श्री राम स्वभाव से ही धर्मात्मा थे, इसलिए विभीषण की यह बात उन्हें भी अच्छी लगी। उन्होंने पराक्रमी रघुनाथजी, लक्ष्मण और कार्यकुशल वानरराज सुग्रीव का स्वागत करते हुए मुस्कुराकर उनसे कहा-॥34 1/2॥   |   ramayan सर्ग 6.19: विभीषण का आकाश से उतरकर भगवान् श्रीराम के चरणों की शरण लेना, श्रीराम का रावण-वध की प्रतिज्ञा करना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 19: विभीषण का आकाश से उतरकर भगवान् श्रीराम के चरणों की शरण लेना, श्रीराम का रावण-वध की प्रतिज्ञा करना  »  श्लोक 34-35h
 
 
श्लोक  6.19.34-35h 
प्रकृत्या धर्मशीलस्य रामस्यास्याप्यरोचत।
सलक्ष्मणं महातेजा: सुग्रीवं च हरीश्वरम्॥ ३४॥
सत्क्रियार्थं क्रियादक्षं स्मितपूर्वमभाषत।
 
 
अनुवाद
भगवान् श्री राम स्वभाव से ही धर्मात्मा थे, इसलिए विभीषण की यह बात उन्हें भी अच्छी लगी। उन्होंने पराक्रमी रघुनाथजी, लक्ष्मण और कार्यकुशल वानरराज सुग्रीव का स्वागत करते हुए मुस्कुराकर उनसे कहा-॥34 1/2॥
 
Lord Shri Ram was by nature righteous, therefore he also liked this statement of Vibhishan. While welcoming the mighty Raghunathji, Laxman and the efficient monkey king Sugreev, he smiled and said to them -॥ 34 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)