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ramayan 6.17.42: महाराज! यदि उसमें बड़े-बड़े दोष हों तो निःसंदेह उसका त्याग कर देना ही श्रेयस्कर है। गुणों की दृष्टि से यदि यह पाया जाए कि उसमें अनेक अच्छे गुण हैं, तभी उसे अपनाना चाहिए। 42॥   |   ramayan सर्ग 6.17: विभीषण का श्रीराम की शरण में आना और श्रीराम का अपने मन्त्रियों के साथ उन्हें आश्रय देने के विषय में विचार करना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.17.42 
यदि दोषो महांस्तस्मिंस्त्यज्यतामविशङ्कितम्।
गुणान् वापि बहून् ज्ञात्वा संग्रह: क्रियतां नृप॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
महाराज! यदि उसमें बड़े-बड़े दोष हों तो निःसंदेह उसका त्याग कर देना ही श्रेयस्कर है। गुणों की दृष्टि से यदि यह पाया जाए कि उसमें अनेक अच्छे गुण हैं, तभी उसे अपनाना चाहिए। 42॥
 
Maharaj! If it has major defects then it is undoubtedly better to discard it. From the point of view of qualities, if it is found that he has many good qualities, then only that person should be adopted. 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)