श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 16: रावण के द्वारा विभीषण का तिरस्कार और विभीषण का भी उसे फटकारकर चल देना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  6.16.3 
जानामि शीलं ज्ञातीनां सर्वलोकेषु राक्षस।
हृष्यन्ति व्यसनेष्वेते ज्ञातीनां ज्ञातय: सदा॥ ३॥
 
 
अनुवाद
राक्षस! मैं समस्त लोकों में एक ही जाति के लोगों का स्वभाव अच्छी तरह जानता हूँ। एक ही जाति के लोग सदैव अपने ही जाति के लोगों के कष्टों में प्रसन्न होते हैं॥3॥
 
Demon! I know very well the nature of people of the same caste in all the worlds. People of the same caste always rejoice in the troubles of their fellow caste people.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)