श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 16: रावण के द्वारा विभीषण का तिरस्कार और विभीषण का भी उसे फटकारकर चल देना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  6.16.19 
स त्वं भ्रान्तोऽसि मे राजन् ब्रूहि मां यद् यदिच्छसि।
ज्येष्ठो मान्य: पितृसमो न च धर्मपथे स्थित:।
इदं हि परुषं वाक्यं न क्षमाम्यग्रजस्य ते॥ १९॥
 
 
अनुवाद
राजा! आपका मन भ्रमित है। आप धर्म के मार्ग पर नहीं हैं। मेरे बड़े भाई होने के नाते आप मेरे पिता के समान आदरणीय हैं। अतः आप मुझसे जो चाहें कहें; किन्तु बड़े भाई होने के बावजूद मैं आपके मुँह से ऐसे कठोर वचन सहन नहीं कर सकता॥ 19॥
 
King! Your mind is in confusion. You are not on the path of Dharma. As my elder brother, you are as respectable as my father. Therefore, you may say whatever you want to me; but despite being my elder brother, I cannot tolerate such harsh words from you.॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)