श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 16: रावण के द्वारा विभीषण का तिरस्कार और विभीषण का भी उसे फटकारकर चल देना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  6.16.15 
यथा पूर्वं गज: स्नात्वा गृह्य हस्तेन वै रज:।
दूषयत्यात्मनो देहं तथानार्येषु सौहृदम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जैसे हाथी पहले स्नान करता है और फिर अपनी सूँड़ से धूल उड़ाकर अपने शरीर को गंदा कर लेता है, वैसे ही दुष्ट लोगों की मित्रता भी दूषित हो जाती है॥15॥
 
Just as an elephant first bathes and then dirties its body by throwing dust with its trunk, similarly the friendship of wicked people is contaminated.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)