श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 16: रावण के द्वारा विभीषण का तिरस्कार और विभीषण का भी उसे फटकारकर चल देना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  6.16.14 
यथा मधुकरस्तर्षात् काशपुष्पं पिबन्नपि।
रसमत्र न विन्देत तथानार्येषु सौहृदम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जैसे मधुमक्खी रस की इच्छा से फूल से रस पीने का प्रयत्न करती है, परन्तु उसे रस नहीं मिलता, वैसे ही अनार्यों में जो स्नेह है, वह किसी के लिए भी हितकर नहीं है ॥14॥
 
Just as a bee, desiring nectar, tries to drink from a flower but cannot find the nectar in it, similarly the affection among non-Aryans is not beneficial to anyone. ॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)