श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 128: भरत का श्रीराम को राज्य लौटाना, श्रीराम की नगरयात्रा, राज्याभिषेक, वानरों की विदार्इ तथा ग्रन्थ का माहात्म्य  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  6.128.83 
हनूमांस्तेन हारेण शुशुभे वानरर्षभ:।
चन्द्रांशुचयगौरेण श्वेताभ्रेण यथाचल:॥ ८३॥
 
 
अनुवाद
उस हार को धारण करके वानरश्रेष्ठ हनुमानजी ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो कोई पर्वत चन्द्रमा की किरणों के समान श्वेत बादलों की माला से सुशोभित हो।
 
With that necklace, Hanuman, the best of the apes, appeared as beautiful as if a mountain was adorned with a garland of white clouds resembling the rays of the moon. 83.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)