श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 128: भरत का श्रीराम को राज्य लौटाना, श्रीराम की नगरयात्रा, राज्याभिषेक, वानरों की विदार्इ तथा ग्रन्थ का माहात्म्य  »  श्लोक 77-78
 
 
श्लोक  6.128.77-78 
मणिप्रवरजुष्टं तं मुक्ताहारमनुत्तमम्॥ ७७॥
सीतायै प्रददौ रामश्चन्द्ररश्मिसमप्रभम्।
अरजे वाससी दिव्ये शुभान्याभरणानि च॥ ७८॥
 
 
अनुवाद
भगवान राम ने सीता के गले में उत्तम रत्नों से जड़ित वह अत्यंत सुंदर मोतियों का हार पहनाया (जो वायुदेवता ने भेंट किया था) जो चन्द्रमा की किरणों के समान चमक रहा था। उन्होंने सीता को दो दिव्य वस्त्र भी भेंट किए जो कभी मैले नहीं होते थे और अन्य अनेक सुंदर आभूषण भी दिए।
 
Lord Rama placed around Sita's neck that most beautiful pearl necklace studded with the finest gems (which was presented by Vayu Devta and) which shone like the rays of the moon. He also presented her with two divine clothes which would never become dirty and many other beautiful ornaments. 77-78.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)