श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 128: भरत का श्रीराम को राज्य लौटाना, श्रीराम की नगरयात्रा, राज्याभिषेक, वानरों की विदार्इ तथा ग्रन्थ का माहात्म्य  »  श्लोक 75-76h
 
 
श्लोक  6.128.75-76h 
अर्करश्मिप्रतीकाशां काञ्चनीं मणिविग्रहाम्॥ ७५॥
सुग्रीवाय स्रजं दिव्यां प्रायच्छन्मनुजाधिप:।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् राजा श्रीराम ने अपने मित्र सुग्रीव को सूर्य की किरणों के समान चमकती हुई एक दिव्य स्वर्ण माला प्रदान की, जो अनेक रत्नों से जड़ित थी।
 
After that King Shri Ram presented his friend Sugreeva with a divine garland of gold which was shining like the rays of the sun. It was studded with many gems. 75 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)