श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 128: भरत का श्रीराम को राज्य लौटाना, श्रीराम की नगरयात्रा, राज्याभिषेक, वानरों की विदार्इ तथा ग्रन्थ का माहात्म्य  »  श्लोक 118
 
 
श्लोक  6.128.118 
प्रणम्य शिरसा नित्यं श्रोतव्यं क्षत्रियैर्द्विजात्।
ऐश्वर्यं पुत्रलाभश्च भविष्यति न संशय:॥ ११८॥
 
 
अनुवाद
क्षत्रियों को चाहिए कि वे प्रतिदिन सिर झुकाकर तथा प्रणाम करके ब्राह्मण के मुख से इस ग्रन्थ का श्रवण करें। इससे उन्हें धन और पुत्र की प्राप्ति होगी, इसमें कोई संदेह नहीं है ॥118॥
 
Kshatriyas should listen to this book from the mouth of a Brahmin every day with their heads bowed and paying obeisance. There is no doubt that this will give them wealth and a son. 118॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)