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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 127: अयोध्या में श्रीराम के स्वागत की तैयारी, भरत के साथ सबका श्रीराम की अगवानी के लिये नन्दिग्राम में पहुँचना, श्रीराम का आगमन, भरत आदि के साथ उनका मिलाप तथा पुष्पक विमान को कुबेर के पास भेजना  »  श्लोक 43-44
 
 
श्लोक  6.127.43-44 
सुग्रीवं केकयीपुत्रो जाम्बवन्तमथाङ्गदम्।
मैन्दं च द्विविदं नीलमृषभं चैव सस्वजे॥ ४३॥
सुषेणं च नलं चैव गवाक्षं गन्धमादनम्।
शरभं पनसं चैव परित: परिषस्वजे॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद कैकेयी कुमार भरत ने सुग्रीव, जाम्बवान, अंगद, मैन्द, द्विविद, नील, ऋषभ, सुषेण, नल, गवाक्ष, गंधमादन, शरभ और पनस को पूर्णतः अपना लिया। 43-44॥
 
After this, Kaikeyi Kumar Bharat completely embraced Sugriva, Jambavan, Angad, Mainda, Dwivid, Neel, Rishabh, Sushen, Nala, Gavaksh, Gandhamadan, Sharabh and Panas. 43-44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)