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श्लोक  6.126.32-33 
न्यवर्तत तदा रामो मृगं हत्वा तदा वने॥ ३२॥
निवर्तमान: काकुत्स्थो दृष्ट्वा गृध्रं स विव्यथे।
गृध्रं हतं तदा दृष्ट्वा राम: प्रियतरं पितु:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
इसी बीच वन में श्री रामचन्द्रजी एक मृग को मारकर लौट रहे थे। लौटते समय जब उन्होंने अपने पिता से भी अधिक प्रिय गिद्धराज को मारा हुआ देखा, तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ। 32-33.
 
Meanwhile, in the forest, Shri Ramchandraji returned after killing a deer. While returning, when he saw the vulture king, who was dearer to him than his father, killed, he felt very sad. 32-33.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)