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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 126: हनुमान्जी का भरत को श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के वनवाससम्बन्धी सारे वृत्तान्तों को सुनाना  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  6.126.21-22 
ततस्तेनार्दिता बाला रावणं समुपागता॥ २१॥
रावणानुचरो घोरो मारीचो नाम राक्षस:।
लोभयामास वैदेहीं भूत्वा रत्नमयो मृग:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
इस घटना से व्यथित होकर वह मूर्ख राक्षसी लंका में रावण के पास गई। रावण के कहने पर उसके अनुयायी मारीच नामक एक भयंकर राक्षस ने रत्नजटित मृग का रूप धारण करके विदेह राजकुमारी सीता को प्रलोभित किया।
 
‘Distressed by this incident, the foolish demoness went to Ravana in Lanka. At Ravana's behest, his follower, a fierce demon named Marich, took the form of a gemstone-studded deer and tempted Videha princess Sita.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)