श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 115: सीता के चरित्र पर संदेह करके श्रीराम का उन्हें ग्रहण करने से इनकार करना और अन्यत्र जाने के लिये कहना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  6.115.8 
युद्धे विक्रमतश्चैव हितं मन्त्रयतस्तथा।
सुग्रीवस्य ससैन्यस्य सफलोऽद्य परिश्रम:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
सुग्रीव ने अपनी सेना सहित युद्ध में वीरता दिखाई है और समय-समय पर मुझे उपयोगी परामर्श भी देता रहा है। अब उसका प्रयास सफल हो गया है ॥8॥
 
Sugreeva along with his army displayed valour in the war and from time to time he has been giving me useful advice. His efforts have now borne fruit. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)