श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 115: सीता के चरित्र पर संदेह करके श्रीराम का उन्हें ग्रहण करने से इनकार करना और अन्यत्र जाने के लिये कहना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  6.115.20 
रावणाङ्कपरिक्लिष्टां दृष्टां दुष्टेन चक्षुषा।
कथं त्वां पुनरादद्यां कुलं व्यपदिशन्महत्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
रावण ने तुम्हें गोद में लेकर तुम पर कुदृष्टि डाली है, ऐसी दशा में मैं अपने कुल को महान् कहते हुए तुम्हें पुनः कैसे स्वीकार कर सकता हूँ?
 
Ravana has taken you in his lap and has cast his evil eye upon you, in such a condition how can I accept you again, while calling my clan great?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)