श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 115: सीता के चरित्र पर संदेह करके श्रीराम का उन्हें ग्रहण करने से इनकार करना और अन्यत्र जाने के लिये कहना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  6.115.15 
विदितश्चास्तु भद्रं ते योऽयं रणपरिश्रम:।
सुतीर्ण: सुहृदां वीर्यान्न त्वदर्थं मया कृत:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
'आपका कल्याण हो। आप यह जान लें कि इस युद्ध में मैंने जो कष्ट उठाए हैं और इन मित्रों के पराक्रम से जो विजय प्राप्त की है, वह सब आपको जीतने के लिए नहीं किया गया है॥15॥
 
‘May you be blessed. You must know that the hardships I have undertaken in this war and the victory I have achieved through the valour of these friends, all this has not been done to win you.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)