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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 113: हनुमान्जी का सीताजी से बातचीत करके लौटना और उनका संदेश श्रीराम को सुनाना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  6.113.44 
न पर: पापमादत्ते परेषां पापकर्मणाम्।
समयो रक्षितव्यस्तु सन्तश्चारित्रभूषणा:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
'सज्जन पुरुष दूसरों की निन्दा करने वाले पापियों के पापों को ग्रहण नहीं करते। बदले में वे स्वयं भी उनके साथ पापपूर्ण व्यवहार नहीं करना चाहते। इसलिए मनुष्य को अपने व्रत और सदाचार की रक्षा करनी चाहिए। क्योंकि सदाचारी पुरुष अपने अच्छे चरित्र से सुशोभित होते हैं। सदाचार ही उनका आभूषण है।' ॥4 4॥
 
‘The noble men do not adopt the sins of sinners who speak ill of others. In return they do not want to behave sinfully with them themselves. Therefore, one must protect one's vows and good conduct. Because the virtuous men are adorned with their good character. Good conduct is their ornament.' ॥ 4 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)