| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 6: युद्ध काण्ड » सर्ग 113: हनुमान्जी का सीताजी से बातचीत करके लौटना और उनका संदेश श्रीराम को सुनाना » श्लोक 34-37h |
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| | | | श्लोक 6.113.34-37h  | राक्षस्यो दारुणकथा वरमेतत् प्रयच्छ मे।
मुष्टिभि: पार्ष्णिघातैश्च विशालैश्चैव बाहुभि:॥ ३४॥
जङ्घाजानुप्रहारैश्च दन्तानां चैव पीडनै:।
कर्तनै: कर्णनासानां केशानां लुञ्चनैस्तथा॥ ३५॥
निपात्य हन्तुमिच्छामि तव विप्रियकारिणी:।
एवं प्रहारैर्बहुभि: सम्प्रहार्य यशस्विनि॥ ३६॥
घातये तीव्ररूपाभिर्याभिस्त्वं तर्जिता पुरा। | | | | | | अनुवाद | | मैं इनको घूँसों, लातों, विशाल भुजाओं, थप्पड़ों, पिंडलियों और घुटनों से घायल करना चाहता हूँ, इनके दाँत तोड़ दूँ, इनके नाक-कान काट दूँ और इनके केश नोच लूँ। यशस्विनी! इस प्रकार बहुत-से प्रहार करके मैं इन क्रूर वाणी बोलने वाली दुष्ट राक्षसियों को मार डालूँगा। जिन भयानक राक्षसों ने पहले तुम्हें फटकारा है, उन सबका मैं वध करूँगा। इसके लिए तुम मुझे केवल वर (अनुमति) दो॥ 34-36 1/2॥ | | | | ‘I wish to injure them with punches, kicks, huge arms, slaps, calves and knees, break their teeth, cut off their noses and ears and tear their hair. Yashaswini! By beating them all with many blows in this manner, I will kill these obnoxious demonesses who speak cruelly. I will kill all those terrifying demonesses who have rebuked you earlier. For this, you just give me a boon (permission)’॥ 34-36 1/2॥ | | ✨ ai-generated | | |
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