| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 6: युद्ध काण्ड » सर्ग 113: हनुमान्जी का सीताजी से बातचीत करके लौटना और उनका संदेश श्रीराम को सुनाना » श्लोक 27-28 |
|
| | | | श्लोक 6.113.27-28  | श्लाघनीयोऽनिलस्य त्वं सुत: परमधार्मिक:।
बलं शौर्यं श्रुतं सत्त्वं विक्रमो दाक्ष्यमुत्तमम्॥ २७॥
तेज: क्षमा धृति: स्थैर्यं विनीतत्वं न संशय:।
एते चान्ये च बहवो गुणास्त्वय्येव शोभना:॥ २८॥ | | | | | | अनुवाद | | 'आप वायुदेवता के प्रशंसनीय पुत्र और अत्यन्त गुणवान हैं। शारीरिक बल, पराक्रम, शास्त्रज्ञान, मानसिक बल, पराक्रम, उत्तम कौशल, तेज, क्षमा, धैर्य, स्थिरता, विनय और अन्य अनेक सुन्दर गुण एक साथ केवल आपमें ही विद्यमान हैं, इसमें संशय नहीं है।'॥27-28॥ | | | | ‘You are the praiseworthy son of Vayu Devta and a very virtuous person. Physical strength, bravery, knowledge of scriptures, mental strength, valour, excellent skill, brilliance, forgiveness, patience, stability, humility and many other beautiful qualities are present together only in you, there is no doubt about this.'॥ 27-28॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|