श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 113: हनुमान्जी का सीताजी से बातचीत करके लौटना और उनका संदेश श्रीराम को सुनाना  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  6.113.12-13 
सम्भ्रमश्च न कर्तव्यो वर्तन्त्या रावणालये।
विभीषणविधेयं हि लङ्कैश्वर्यमिदं कृतम्॥ १२॥
तदाश्वसिहि विस्रब्धं स्वगृहे परिवर्तसे।
अयं चाभ्येति संहृष्टस्त्वद्दर्शनसमुत्सुक:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
अब यह सोचकर भयभीत न हो कि तू रावण के घर में है; क्योंकि लंका का सारा धन विभीषण को सौंप दिया गया है। अब तू अपने घर में है। ऐसा जानकर तू निश्चिंत होकर धैर्य धारण कर। देवि! यह विभीषण भी अब हर्ष से भरकर तेरे दर्शन के लिए आतुर होकर यहाँ आ रहा है।॥12-13॥
 
‘Now do not be afraid thinking that you are in Ravana's house; because all the wealth of Lanka has been handed over to Vibhishan. Now you are in your own house. Knowing this, be at peace and have patience. Devi! This Vibhishan is also coming here now, filled with joy and eager to see you.'॥ 12-13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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