श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 111: मन्दोदरी का विलाप तथा रावण के शव का दाह-संस्कार  »  श्लोक 85-86h
 
 
श्लोक  6.111.85-86h 
धिगस्तु हृदयं यस्या ममेदं न सहस्रधा॥ ८५॥
त्वयि पञ्चत्वमापन्ने फलते शोकपीडितम्।
 
 
अनुवाद
तुम्हारे मरने पर भी मेरा शोकग्रस्त हृदय हजार टुकड़ों में नहीं टूटता; इसलिए मुझ पाषाण हृदयवाली स्त्री को धिक्कार है। ॥85 1/2॥
 
"Even after your death my grief-stricken heart does not break into thousands of pieces; hence shame on me, the woman with a heart of stone." ॥ 85 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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