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श्लोक 6.111.50  |
लोकक्षोभयितारं च साधुभूतविदारणम्।
ओजसा दृप्तवाक्यानां वक्तारं रिपुसंनिधौ॥ ५०॥ |
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| अनुवाद |
| ‘तुमने सम्पूर्ण जगत् को व्याकुल कर दिया है, सज्जनों को हानि पहुँचाई है और शत्रुओं से बलपूर्वक तथा अहंकारपूर्वक बातें की हैं ॥ 50॥ |
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| ‘You have agitated the entire world, harmed the virtuous and spoken forcefully and arrogantly to your enemies.॥ 50॥ |
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