श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 111: मन्दोदरी का विलाप तथा रावण के शव का दाह-संस्कार  »  श्लोक 112-113
 
 
श्लोक  6.111.112-113 
रावणं प्रयते देशे स्थाप्य ते भृशदु:खिता:॥ ११२॥
चितां चन्दनकाष्ठैश्च पद्मकोशीरचन्दनै:।
ब्राह्मॺा संवर्तयामासू राङ्कवास्तरणावृताम्॥ ११३॥
 
 
अनुवाद
आगे जाकर रावण के विमान को एक पवित्र स्थान पर रखकर अत्यन्त दुःखी हुए विभीषण आदि राक्षसों ने मलय-चन्दन, पद्मक, उशीर (खस) आदि अनेक प्रकार के चन्दन की सहायता से चिता बनाकर उस पर रंकु नामक मृग की खाल बिछा दी।
 
Going further, after placing Ravana's plane in a holy place, the demons like Vibhishana, who were very sad, made a funeral pyre with the help of Malay-sandalwood, Padmak, Ushir (Khas) and other types of sandalwood and spread the skin of a deer named Ranku on it.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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