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श्लोक 6.111.100-101h  |
मरणान्तानि वैराणि निर्वृत्तं न: प्रयोजनम्॥ १००॥
क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव। |
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| अनुवाद |
| 'वैर तो मृत्युपर्यन्त ही रहता है। मृत्युपर्यन्त उसका अन्त हो जाता है। अब हमारा प्रयोजन सिद्ध हो गया है, अतः इस समय वह तुम्हारा भाई है, उसी प्रकार मेरा भी भाई है; अतः उसका दाह-संस्कार करो।॥100 1/2॥ |
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| ‘Enmity lasts only till death. It ends after death. Now our purpose has been achieved, so at this time he is my brother just as he is yours; therefore cremate him.॥ 100 1/2॥ |
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