श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 110: रावण की स्त्रियों का विलाप  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  6.110.19 
ब्रुवाणोऽपि हितं वाक्यमिष्टो भ्राता विभीषण:।
दृष्टं परुषितो मोहात् त्वयाऽऽत्मवधकांक्षिणा॥ १९॥
 
 
अनुवाद
तुम्हारा प्रिय भाई विभीषण तुम्हारे हित की बातें कह रहा था, परन्तु तुमने अपनी मृत्यु के मोह से उसे कटु वचन कहे, उसका फल अब प्रत्यक्ष है॥19॥
 
Your dear brother Vibhishan was telling you things that were good for you, but you spoke harsh words to him out of attachment for your own death. The result of that is evident now.॥ 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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