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श्लोक 6.11.31  |
स रावण: शस्त्रभृतां मनस्विनां
महाबलानां समितौ मनस्वी।
तस्यां सभायां प्रभया चकाशे
मध्ये वसूनामिव वज्रहस्त:॥ ३१॥ |
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| अनुवाद |
| जब सभा में अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित बहुत से महाबली योद्धा उपस्थित थे, तब उनके मध्य बैठा हुआ बुद्धिमान रावण अपनी प्रभा से उसी प्रकार चमक रहा था, जैसे वसुओं के मध्य वज्र धारण करने वाले इन्द्र चमकते हैं। |
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| When there were many mighty warriors armed with weapons in the assembly, the intelligent Ravana seated in their midst was shining with his radiance in the same way as Indra wielding the thunderbolt shines among the Vasus. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकादश: सर्ग:॥ ११॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११॥ |
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