श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 108: श्रीराम के द्वारा रावण का वध  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  6.108.3 
तत: संस्मारितो रामस्तेन वाक्येन मातले:।
जग्राह स शरं दीप्तं नि:श्वसन्तमिवोरगम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
मातलि के इस वाक्य से श्री रामचन्द्रजी को उस अस्त्र का स्मरण हो आया और उन्होंने फुफकारते हुए सर्प के समान तीक्ष्ण बाण हाथ में ले लिया॥3॥
 
With this sentence of Matali, Shri Ramchandraji remembered that weapon. Then, hissing, he took in his hand a sharp arrow like a snake. 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)