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ramayan 6.107.58-59h: तत्पश्चात, कौसल्या के आनंद को बढ़ाने वाले और समस्त अस्त्र-शस्त्रों को जानने वाले वीर श्री रामचंद्रजी अनेक प्रकार के बाणों से सुसज्जित होते हुए भी इस प्रकार चिंता करने लगे-॥   |   ramayan सर्ग 6.107: श्रीराम और रावण का घोर युद्ध   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 107: श्रीराम और रावण का घोर युद्ध  »  श्लोक 58-59h
 
 
श्लोक  6.107.58-59h 
तत: सर्वास्त्रविद् वीर: कौसल्यानन्दवर्धन:॥ ५८॥
मार्गणैर्बहुभिर्युक्तश्चिन्तयामास राघव:।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात, कौसल्या के आनंद को बढ़ाने वाले और समस्त अस्त्र-शस्त्रों को जानने वाले वीर श्री रामचंद्रजी अनेक प्रकार के बाणों से सुसज्जित होते हुए भी इस प्रकार चिंता करने लगे-॥
 
Thereafter, the brave Shri Ramchandraji, who increased the joy of Kausalya and knew all the weapons, despite being equipped with many types of arrows, started worrying like this -॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)