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ramayan 6.105.24: (यज्ञों में भाग लेने वाले देवता) ही यज्ञ और यज्ञों के फल हैं। वे ही सम्पूर्ण जगत में होने वाले समस्त कार्यों का फल देने में समर्थ हैं।   |   ramayan सर्ग 6.105: अगस्त्य मुनि का श्रीराम को विजय के लिये “आदित्यहृदय” के पाठ की सम्मति देना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.105.24 
देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमप्रभु:॥ २४॥
 
 
अनुवाद
(यज्ञों में भाग लेने वाले देवता) ही यज्ञ और यज्ञों के फल हैं। वे ही सम्पूर्ण जगत में होने वाले समस्त कार्यों का फल देने में समर्थ हैं।
 
‘The gods (who take part in the sacrifices) are the sacrifices and the fruits of the sacrifices. They alone are capable of giving the results of all the activities that take place in the entire world.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)