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ramayan 6.104.23: शत्रुसूदन वीर! अब मुझे आज्ञा दीजिए। आप जो उचित समझें और कहें, मैं आपका ऋण चुकाने की भावना से वैसा ही करूँगा।॥23॥   |   ramayan सर्ग 6.104: रावण का सारथि को फटकारना और सारथि का अपने उत्तर से रावण को संतुष्ट करके उसके रथ को रणभूमि में पहुँचाना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 104: रावण का सारथि को फटकारना और सारथि का अपने उत्तर से रावण को संतुष्ट करके उसके रथ को रणभूमि में पहुँचाना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  6.104.23 
आज्ञापय यथातत्त्वं वक्ष्यस्यरिनिषूदन।
तत् करिष्याम्यहं वीर गतानृण्येन चेतसा॥ २३॥
 
 
अनुवाद
शत्रुसूदन वीर! अब मुझे आज्ञा दीजिए। आप जो उचित समझें और कहें, मैं आपका ऋण चुकाने की भावना से वैसा ही करूँगा।॥23॥
 
‘Shatrusudan Veer! Now give me your orders. Whatever you think is right and say, I will do it with the feeling of repaying my debt to you.’॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)