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ramayan 6.104.22: हे पराक्रमी! हे प्रभु! मैंने अपनी इच्छा से नहीं, अपितु अपने स्वामी के प्रति स्नेह और उनकी रक्षा के लिए इस रथ को हटाया है॥ 22॥   |   ramayan सर्ग 6.104: रावण का सारथि को फटकारना और सारथि का अपने उत्तर से रावण को संतुष्ट करके उसके रथ को रणभूमि में पहुँचाना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 104: रावण का सारथि को फटकारना और सारथि का अपने उत्तर से रावण को संतुष्ट करके उसके रथ को रणभूमि में पहुँचाना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  6.104.22 
स्वेच्छया न मया वीर रथोऽयमपवाहित:।
भर्तु: स्नेहपरीतेन मयेदं यत् कृतं प्रभो॥ २२॥
 
 
अनुवाद
हे पराक्रमी! हे प्रभु! मैंने अपनी इच्छा से नहीं, अपितु अपने स्वामी के प्रति स्नेह और उनकी रक्षा के लिए इस रथ को हटाया है॥ 22॥
 
Valiant! O Lord! I have moved this chariot away not to do as I please, but out of affection for my master and to protect him.॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)