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ramayan 6.104.11: महाराज! मैं भयभीत नहीं हूँ। मेरी बुद्धि नष्ट नहीं हुई है, न ही शत्रुओं ने मुझे गुमराह किया है। मैं प्रमाद भी नहीं करता। आपके प्रति मेरा प्रेम कम नहीं हुआ है और आपके द्वारा किए गए आतिथ्य को मैं भूला नहीं हूँ॥ 11॥   |   ramayan सर्ग 6.104: रावण का सारथि को फटकारना और सारथि का अपने उत्तर से रावण को संतुष्ट करके उसके रथ को रणभूमि में पहुँचाना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 104: रावण का सारथि को फटकारना और सारथि का अपने उत्तर से रावण को संतुष्ट करके उसके रथ को रणभूमि में पहुँचाना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  6.104.11 
न भीतोऽस्मि न मूढोऽस्मि नोपजप्तोऽस्मि शत्रुभि:।
न प्रमत्तो न नि:स्नेहो विस्मृता न च सत्क्रिया॥ ११॥
 
 
अनुवाद
महाराज! मैं भयभीत नहीं हूँ। मेरी बुद्धि नष्ट नहीं हुई है, न ही शत्रुओं ने मुझे गुमराह किया है। मैं प्रमाद भी नहीं करता। आपके प्रति मेरा प्रेम कम नहीं हुआ है और आपके द्वारा किए गए आतिथ्य को मैं भूला नहीं हूँ॥ 11॥
 
‘Maharaj! I am not afraid. My wisdom has not been destroyed and neither have I been misled by the enemies. I am not careless either. My love for you has not diminished and I have not forgotten the hospitality you have shown me.॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)