श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 103: श्रीराम का रावण को फटकारना और उनके द्वार घायल किये गये रावण को सारथि का रणभूमि से बाहर ले जाना  »  श्लोक 28-30
 
 
श्लोक  6.103.28-30 
यदा च शस्त्रं नारेभे न चकर्ष शरासनम्।
नास्य प्रत्यकरोद् वीर्यं विक्लवेनान्तरात्मना॥ २८॥
क्षिप्ताश्चाशु शरास्तेन शस्त्राणि विविधानि च।
मरणार्थाय वर्तन्ते मृत्युकालोऽभ्यवर्तत॥ २९॥
सूतस्तु रथनेतास्य तदवस्थं निरीक्ष्य तम्।
शनैर्युद्धादसम्भ्रान्तो रथं तस्यापवाहयत्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
जब उसके हृदय की चिन्ता के कारण उसमें भुजाएँ उठाने, धनुष खींचने और भगवान् रामजी के पराक्रम का सामना करने की शक्ति न रही, और जब भगवान् रामजी के चलाए हुए तीव्र बाण और नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र उसकी मृत्यु का कारण बन गए और उसकी मृत्यु का समय निकट आ गया, तब उसे ऐसी अवस्था में देखकर उसके सारथि ने बिना किसी घबराहट के उसके रथ को युद्धभूमि से हटा दिया॥28-30॥
 
When due to the anxiety of his heart he no longer had the strength to lift his arms, to draw his bow and to face the valour of Lord Rama, and when the swift arrows and various weapons fired by Lord Rama became the cause of his death and the time of his death came near, then seeing him in such a state, his charioteer without any panic drove his chariot away from the battlefield.॥28-30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)