श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 103: श्रीराम का रावण को फटकारना और उनके द्वार घायल किये गये रावण को सारथि का रणभूमि से बाहर ले जाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  6.103.17 
शूरोऽहमिति चात्मानमवगच्छसि दुर्मते।
नैव लज्जास्ति ते सीतां चौरवद् व्यपकर्षत:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे दुष्ट निशाचर! तू अपने को बड़ा वीर समझता है; परन्तु जब तूने चोर की भाँति सीता का अपहरण किया, तब तुझे तनिक भी लज्जा नहीं आई?॥17॥
 
You evil-minded night-walker! You think yourself to be full of bravery; but when you stole Sita like a thief, did you not feel even a little ashamed?॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)