श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 102: इन्द्र के भेजे हुए रथ पर बैठकर श्रीराम का रावण के साथ युद्ध करना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  6.102.25 
ते राघवधनुर्मुक्ता रुक्मपुङ्खा: शिखिप्रभा:।
सुपर्णा: काञ्चना भूत्वा विचेरु: सर्पशत्रव:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् श्री रघुनाथजी के धनुष से छूटे हुए अग्नि के समान तेजस्वी सुवर्णमय पंख वाले बाण सर्पों के शत्रु सुवर्णमय गरुड़ के समान सर्वत्र विचरण करने लगे॥25॥
 
Then, the golden-winged arrows, as bright as fire, released from the bow of Shri Raghunathji, started roaming everywhere like the golden eagle, the enemy of the snakes. 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)