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ramayan 6.101.14: हाय! जो मेरे प्रिय मित्र थे और मुझसे सदैव प्रेम करते थे, उनसे छलपूर्वक युद्ध करने वाले राक्षसों ने आज उनकी यह दशा कर दी है॥14॥   |   ramayan सर्ग 6.101: श्रीराम का विलाप तथा हनुमान्जी की लायी हुर्इ ओषधि के सुषेण द्वारा किये गये प्रयोग से लक्ष्मण का सचेत हो उठना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 101: श्रीराम का विलाप तथा हनुमान्जी की लायी हुर्इ ओषधि के सुषेण द्वारा किये गये प्रयोग से लक्ष्मण का सचेत हो उठना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  6.101.14 
इष्टबन्धुजनो नित्यं मां स नित्यमनुव्रत:।
इमामवस्थां गमितो राक्षसै: कूटयोधिभि:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हाय! जो मेरे प्रिय मित्र थे और मुझसे सदैव प्रेम करते थे, उनसे छलपूर्वक युद्ध करने वाले राक्षसों ने आज उनकी यह दशा कर दी है॥14॥
 
Alas! Those who were my dear friends and always loved me, the demons who fought with them deceitfully have reduced them to this state today.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)