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श्लोक 6.100.62  |
स कीर्यमाण: शरजालवृष्टिभि-
र्महात्मना दीप्तधनुष्मतार्दित:।
भयात् प्रदुद्राव समेत्य रावणो
यथानिलेनाभिहतो बलाहक:॥ ६२॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे वायु के झोंके से बादल फट जाता है, उसी प्रकार तेजस्वी धनुषधारी महाबली राम के बाणों की वर्षा से रावण आहत और पीड़ित होकर भयभीत होकर वहाँ से भाग गया। |
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| Just as a cloud is torn apart by the blows of wind, similarly Ravana, hurt and afflicted by the shower of arrows of the great Rama, who wielded the effulgent bow, fled from there in fear. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे शततम: सर्ग: ॥ १ ००॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सौवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १ ००॥ |
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