श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 100: राम और रावण का युद्ध, रावण की शक्ति से लक्ष्मण का मूर्च्छित होना तथा रावण का युद्ध से भागना  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  6.100.53 
दृष्टिं दृष्टिविषस्येव सर्पस्य मम रावण:।
यथा वा वैनतेयस्य दृष्टिं प्राप्तो भुजंगम:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार प्राणनाशक विष फैलाने वाले सर्प की दृष्टि के सामने आकर कोई भी मनुष्य जीवित नहीं रह सकता, अथवा जैसे विनतानन्दन गरुड़ के सामने आकर कोई भी महासर्प जीवित नहीं रह सकता, उसी प्रकार आज रावण मेरे सामने आकर जीवित या सकुशल नहीं लौट सकता॥ 53॥
 
‘Just as no human being can survive coming in front of the eyes of a serpent whose mere glance spreads lethal venom, or just as no great serpent can survive coming in sight of Vinataanandan Garuda, similarly, Ravana cannot come in front of me today and return alive or unharmed.॥ 53॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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