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श्लोक 6.100.45  |
अचिन्तयित्वा तान् बाणान् समाश्लिष्य च लक्ष्मणम्।
अब्रवीच्च हनूमन्तं सुग्रीवं च महाकपिम्॥ ४५॥ |
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| अनुवाद |
| परंतु उन बाणों की उपेक्षा करके भगवान श्री राम ने लक्ष्मण को हृदय से लगा लिया और हनुमान तथा महाबली वानर सुग्रीव से बोले- 45॥ |
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| But ignoring those arrows, Lord Shri Ram embraced Lakshman in his heart and said to Hanuman and the great monkey Sugriva - 45॥ |
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