श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 10: विभीषण का रावण के महल में जाना, उसे अपशकुनों का भय दिखाकर सीता को लौटा देने के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  6.10.27-28 
हितं महार्थं मृदु हेतुसंहितं
व्यतीतकालायतिसम्प्रतिक्षमम्।
निशम्य तद्वाक्यमुपस्थितज्वर:
प्रसङ्गवानुत्तरमेतदब्रवीत्॥ २७॥
भयं न पश्यामि कुतश्चिदप्यहं
न राघव: प्राप्स्यति जातु मैथिलीम्।
सुरै: सहेन्द्रैरपि संगरे कथं
ममाग्रत: स्थास्यति लक्ष्मणाग्रज:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
विभीषण के इन कल्याणकारी, महान धन-धान्य के लिए हितकारी, सौम्य, तर्कशील तथा भूत, भविष्य तथा वर्तमान काल में मनोवांछित फल प्रदान करने वाले वचनों को सुनकर रावण को ज्वर हो गया। वह श्रीराम से बढ़ती हुई शत्रुता के प्रति आसक्त हो गया था। अतः उसने इस प्रकार उत्तर दिया - 'विभीषण! मुझे कहीं से भी कोई भय नहीं दिखाई देता। राम मिथिला की पुत्री सीता को कभी प्राप्त नहीं कर सकते। इन्द्र आदि देवताओं की सहायता पाकर भी लक्ष्मण के बड़े भाई राम युद्ध में मेरे सामने कैसे टिक सकेंगे?'
 
Hearing these words of Vibhishan which were beneficial, beneficial for great wealth, gentle, logical and capable of achieving the desired results in the past, future and present times, Ravana got feverish. He had become obsessed with increasing enmity with Shri Ram. Therefore, he replied like this - 'Vibhishan! I do not see any fear from anywhere. Ram can never get Mithila's daughter Sita. Even after getting the help of the gods including Indra, how will Lakshman's elder brother Ram be able to stand against me in a battle?'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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